सालों से जंजीरों में बंधक बना है जिंदगी

128

जन्म और मृत्यु उस रचयिता के हाथ में है,  वह एक मात्र हैँ जो ऊपर बैठे लेखांकन करते है, कि जीवन का हर पल कैसे व्यतीत होगा.

मयूरभंज जिले के सामाखुंटा प्रखंड में भी ऐसा ही एक दर्द भरा दृश्य देखने मिला है.

एक परिवार में चार सदस्य हैं, पिता, माता और भाई और बहेन . जिसके वारे मे बताने जा रहे हैँ वो घरके बड़े बेटे हैं.  जिनका नाम कान्हू पात्र है, सालों से वो जंजीरों से बंधे हुए जिंदगी गुज़ार रहे हैँ. वह जन्म से ऐसा नहीं थे,  जैसे ही वह जीवन के पथ पर चलना सुरु किये थे, उसीवक़्त भगवान ने अपना ऐसा कहर बरसाया के आज वो जंजीरों मे जिंदगी बिता रहे हैँ . भगवान का ऐसा सख्त प्रहार से कान्हा खुदसे इतना दूर हो गए के अपना पहचान के साथ साथ दिमाखी संतुलन खो बैठे. हर कोई उन्हें अनजान लगने लगा भले वो उनकी मा भी हो. परिवार का मुखिया उनके पिता प्रभाकर पात्र हैं, जो एक दिहाड़ी मजदूर हैं.  जब भी वह रोजी रोटी कमाने जाते हैँ पूरा परिबार यह उम्मीद लिए उनका वापस आने के राह देखता रहता है के उनके आने से अपने परिवार के किसी अन्य सदस्य के पेट में मुट्ठी भर चावल मिल जायेगा. रहने के लिए इंदिरा आवास योजना के तहत जो घर मिला वहीँ पे गुजारा कर रहे हैँ. परिवार की दर्द भरा कहानी जैसे, जिंदगी की जंग हारकर लाचार अवस्था में जीने जैसी है.  यह सच है कि जीवन के नाटक मंच पर एक एक कलाकार के रूप में प्रदर्शन करके अपने रोजी रोटी कमा रहे हैँ , लेकिन  कई बार ऐसा होता है जब मंच पर प्रदर्शन करने को इंसान असमर्थ हो जाता है या नाटक  देखने के लिए ना दर्शक का भीड़ रहता है . तभी बहुत सारे ऐसे भी हैँ जो जीने का हौसला छोड़ देते हैँ. 

 बड़े बेटे को 4 साल के उमर से  21साल हो गया, जंजीरो में बांधकर रखा गया है. उनके इलाज के लिए पड़ोसि और गांव वालों से पैसा इकठा कर कटक और रांची हस्पतालों मे पहुंच पाए थे , पर वहां से ऑपरेशन से यह ठीक हो सकते हैँ ऐसा डॉक्टरों का केहना है .पर उसके पिता एक दिहाड़ी मजदूर होने के कारण ऑपरेशन करवाने के लिए असमर्थ हैँ.

आज के दिन मे परिवार के पास महामहिम और ओडिशा के माननीय मुख्यमंत्री, श्री नवीन पटनायक  तक पहुंच के मदद के  लिए प्रार्थना कर सके उतना  संसाधन नही है .

आज पत्रकारिता,समाज के चौथे स्तंभ के रूप में पहचानी जा चुकी है. 

यह खबर मिलते ही लोगों का उम्मीदों मे खड़े उतरने और भरोसा को जितने R9 भारत के टीम पहुंचा प्रभाकर के घर. अपनी बेबसी लोगों के पास पहुंचा पाए, और  सरकार हो या जनता उनसे  मदद का हाथ बढ़ाने की मिन्नती कर सकें . कान्हा के मां भी एक मरीज है, उनका किस पल जिंदगी का आखरी पल होगा मालूम नही. इसलिए कान्हा के प्रति उनके मां का ममता यह उम्मीद लिए के कान्हा के हालत में सुधार हो पायेगा,  वह अपने जीवन के रास्ते में आने वाली किसी भी बाधाओं से लढ कर अपनी जिंदगी गुजार सकेगा , और समाज मे लोगों के साथ कदम से कदम मिला के चल सकें.

देखना होगा कि कान्हा की ऐसी स्थिति  इंसान के रूप मे ईश्वर के दूत बन के , सरकार हो या जिला प्रशासन, या राजनेता, जो आकर मदद करेगा . अपने मानवतावाद का परिचय देकर इलाज के लिए हाथ थामेगा ??

कान्हू के हालातों का अवगत कराने आपातकालीन अधिकारी सुयोग पति से मुलाक़ात करके प्रतिक्रिया लिआ गया. उन्होंने प्रतिक्रिया मे बोले जल्द से जल्द कारवाई होगा और कान्हू के हालातों का जायजा किया जायेगा प्रशासन के तरफ से|