अहिल्याबाई होलकर
देवी,पुण्यश्लोक, साध्वी, गंगाजल सम निर्मल शुद्ध , पवित्र अहिल्या बाई होलकर 42 वर्ष की आयु में इंदौर की रानी बनी। 300 वर्ष पूर्व के भारत में जन्म लेकर अहिल्याबाई होलकर ने अपने जीवन काल में उन ऊंचाइयों को छू लिया जिस पर विरले ही पहुंच पाते हैं। विपरीत परिस्थितियों , और सभी प्रिय जनों को खोने के समय काल में उन्होंने धर्म परायण और कर्तव्य परायण जीवन जिया।

देवी अहिल्या ने अपने तीन दशक के शासन में सकारात्मक सोच, धर्म– कर्म में विश्वास और मानव सेवा को अपना विशेष गुण बनाया। स्थितियों की विकटता में भी उन्होंने स्वयं को सामर्थ्यवान बनाए रखा और ऐसे कार्य किये जो उस समय की परिस्थितियों में असंभव कहे जा सकते थे।
अहिल्याबाई एक साधारण परिवार की साधारण लड़की लेकिन मानवीय गुणों से संपन्न होना उन्हें विशेष बना गया । बाल्यकाल से ही धार्मिक प्रवृत्ति की बालिका जिन्हें किसी ने यह नहीं सिखाया कि वे धर्म– कर्म पर विश्वास करें, न ही इसके लिए उन पर दबाव डाला गया। यह उनके स्वगुण थे जिसमें सत्य वचन बोलना, हमेशा सकारात्मक रहना, हर कार्य को पूरी ईमानदारी के साथ करना, सहनशील होना, दयालु प्रवृत्ति का होना शामिल था।

एक राजा या रानी को ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था किंतु उसमें जिन गुणों की अपेक्षा प्रजा को होती थी वह जरूरी नहीं कि प्रत्येक राजा में दिखाई दे । इंदौर का सौभाग्य था कि उसे ऐसा शासक मिला जो इन गुणों से संपन्न था ।राजा यदि हृदय से उदार हो, उसे प्रजा के दुख से दुख हो तो वह निःसंदेह ईश्वर का प्रतिनिधि है।
अहिल्याबाई का अपने कर्मचारियों को विशेष आदेश था कि उनके राज्य में किसी भी गरीब ,असहाय, विधवा अनाथ, दुखी, विकलांग की तुरंत सहायता की जाए।
कहते हैं ईश्वर अपने सर्वाधिक प्रिय व्यक्ति की कठोर परीक्षा लेते हैं शायद यही कारण था कि अहिल्याबाई का उत्तम चरित्र , शुद्धता ,पवित्रता से युक्त होने के बाद भी उनका पारिवारिक जीवन बहुत कष्टप्रद रहा । पति खांडेराव का निधन फिर पुत्र मालेराव का निधन , पिता स्वरूप स्वसुर मल्हारराव का निधन , इतने पर ही कलगति रुकी नहीं । नाती का निधन ,दामाद यशवंत राव का निधन, बेटी मुक्ताबाई का चले जाना लगातार इतने प्रहार जो किसी साधारण व्यक्ति के लिए प्राणघातक हो जाते लेकिन अहिल्याबाई शोकाकुल तो जरूर होती लेकिन उनकी धार्मिक प्रवृत्ति और मन की मजबूती उन्हें पुनः संभाल ले जाती थी । उनका धैर्य अडिग रहा जीवन अपनी प्रजा के लिए समर्पित रहा ।
राजनीति की गहरी समझ से अहिल्याबाई ने अपने सामने आई हर चुनौती , हर समस्या का चतुराई से सामना किया। सत्ता का विकेंद्रीकरण कर उन्होंने कार्यों को अलग-अलग लोगों को सौंप कर पूरी तन्मयता से राजकाज करने के साथ-साथ अपने धर्म के प्रति भी सजग रही।
अहिल्या बाई को अखंड भारत के महत्व का भी भान था ।यही कारण था की न केवल अपने राज्य में बल्कि पूरे भारत में मंदिरों के जीर्णोद्धार का बीड़ा उठाकर उन्होंने लोगों को धर्म के प्रति सजग और चैतन्य बनाया।
आज जब आज भी विश्व के कई देश युद्ध के साए में जी रहे हैं, युद्ध लड़े जा रहे हैं । राज्यों का विस्तार किया जाना उनकी प्रमुख प्राथमिकता बन गई है। यह स्थिति रानी अहिल्याबाई के समयकाल में और भी विकेट थी । दुनिया के लगभग सभी देश राज्य विस्तार करना चाहते थे ,लेकिन माता अहिल्या, युद्ध के फलस्वरुप होने वाली जन धन की हानि और असंख्य सैनिकों के मारे जाने के बाद उनकी विधवाओं,अनाथ बच्चों की संख्या में होने वाली वृद्धि को बहुत ही दर्द भरा मानती थी । यही कारण था कि अहिल्या बाई ने युद्ध को कभी महत्व नहीं दिया और उसे हमेशा टालने का प्रयास किया । हां जब बात राज्य की सुरक्षा पर आ गई तब युद्ध भी किया।
’सादा जीवन उच्च विचार’ जैसी पंक्तियां अहिल्याबाई होलकर के लिए ही लिखी गई हैं । शुद्ध शाकाहारी जन-जन की प्रिय, अन्य राज्यों से भी सम्मान प्राप्त करने वाली, ईश्वर के लिए जीवन समर्पित करने वाली कर्तव्य निष्ठ अहिल्याबाई ने उपभोगशून्य जीवन जिया और राष्ट्र के लिए , धर्म के लिए
अनुपम उदाहरण बन गई ।