पूज्य “किशोरी” जी ने कहा – उन्नयन-उत्कर्ष का मूल है – अनुशासन !

R9 भारत निखिल वाधवा संवाददता तिल्दा नेवरा

☀ राधे राधे 🌏
06 जनवरी, 2022 (गुरुवार)
पूज्य किशोरी आराध्या आशीषवचनम्
।। श्री: कृपा ।।
🌿 पूज्य “किशोरी” जी ने कहा – उन्नयन-उत्कर्ष का मूल है – अनुशासन ! जिस नदी को एक दिन सागर बनना है, उसके प्रवाह में तटों का अनुशासन सहज अपेक्षित है।किनारों का अवलम्बन टूटते ही नदी अनियंत्रित होकर अपना अस्तित्व खो देती है। अतः जीवन सिद्धि के लिए अनुशासित-पूर्वक मनोदशा सहज और स्वाभाविक रहे ..! ईश्वर को अनुशासन एवं सुव्यवस्थितपना अत्यधिक पसंद है। अतः उन्हें ऐसे लोग ही प्रिय हैं, जो सुव्यवस्था व अनुशासन को अपनाते हैं। व्यवस्था ही सर्जन का मुख्य आधार है। सूर्य, चन्द्र, वायु, पृथ्वी सभी अपने-अपने नियमानुसार चलते हैं। इनके परिभ्रमण में जरा-सा भी अनुशासन भंग हो जाए तो कुछ न कुछ अप्रतिक्षित और विनाशक घटनायें घटती है। चौराहे पर खड़ा ट्रैफिक पुलिस का सिपाही अनुशासन का प्रतीक है। उसकी आज्ञा के उल्लंघन का अर्थ होगा – यातायात में आपा-धापी, दुर्घटनाएँ और परिणामतः, यातायात में अवरोध। अनुशासन से दैनिक जीवन में व्यवस्था आती है। मानवीय गुणों का विकास होता है, नियमित कार्य करने की क्षमता, प्रेरणा प्राप्त होती है और उल्लास प्रकट होता है। कर्तव्य और अधिकार का समुचित ज्ञान होता है। अनुशासन (Discipline) जीवन में रस उत्पन्न करके उसका विकास करता है। उन्नति का द्वार है – अनुशासन। परिष्कार की अग्नि है – अनुशासन, जिससे प्रतिभा योग्यता बन जाती है। अनुशासन स्वभाव में शालीनता उत्पन्न करता है, शिष्टता, विनय और सज्जनता की वृद्धि करता है, शक्ति का दुरुपयोग नहीं होने देता। नियंत्रण पाकर शक्ति संगठित होती है और अपना प्रभाव दिखाती है। इससे व्यक्तिगत जीवन उन्नत होता है। आदर्श, अनुशासन, मर्यादा, परिश्रम, ईमानदारी तथा उच्च मानवीय मूल्यों के बिना किसी का जीवन महान नहीं बन सकता है …।

🌿 पूज्य “किशोरी आराध्या” जी ने कहा – नियम तोड़ने से ही अनुशासन-हीनता बढती है तथा समाज में अव्यवस्था पैदा होती है। आदर्श जीवन की प्राप्ति के लिए दुष्प्रवृत्तियों के त्याग के प्रयास और सद्वृत्तियों के ग्रहण के अभ्यास का दूसरा नाम है – अनुशासन। मन, वचन और कर्म के संयम से जो व्यक्ति मन पर नियंत्रण कर सकता है, उसके वचन और कर्म स्वत: अनुशासित हो जाते हैं। उनमें पवित्रता आ जाती है। यही बात वाणी और कर्म की है। वाणी का अनुशासन (Discipline) मन और कर्म दोनों को निर्मल बनाने में सहायक होता है और कर्म की पवित्रता वाणी में ओज और मन में पुष्प की भावना उत्पन्न करती है। अनुशासन (Discipline) जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में लाभप्रद है, चाहे वह छात्र जीवन हो, परिवार जीवन हो, समाज जीवन हो या राष्ट्र जीवन। अनुशासन जीवन के हर क्षेत्र का प्राण है। जीवन में अनुशासन पालन न केवल आवश्यक ही है, अपितु अनिवार्य भी है। अनुशासित रूप में चलने पर ही जीवन की सफलता आधारित है। जहाँ अनुशासन नहीं, वहाँ सफलता नहीं, समृद्धि नहीं, विकास नहीं। तभी तो महाभारत युद्ध से पूर्व अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा था – ‘शाधि माँ त्वां प्रपन्तम्।’ (प्रभो! मैं आपकी शरण में हूँ, मुझे अनुशासित कीजिए।) जहाँ शील-संयम, सदाचार, मर्यादाओं का अनुपालन और जीवन की व्यवहारिक सीमाओं का सम्मान है, वहाँ देव-अनुग्रह और प्राकृतिक अनुकूलताएं सहज साकार होने लगती हैं। जिस प्रकार सागर तक पहुंचने के लिए सरिताओं में तटों का अवलम्बन आवश्यक है, उसी प्रकार जीवन में उच्चतम लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए आत्मानुशासन परमावश्यक है …।
*किशोरी आराध्या
रायपुर छत्तीसगढ़,

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