जय माता दी।
बलरामपुर के तुलसीपुर से
ब्यूरो रिपोर्ट सुशील श्रीवास्तव
26 सितंबर से शुरू हो रहे शारदीय नवरात्रि पर विशेष

उत्तर-प्रदेश के जनपद बलरामपुर (नेपाल की सीमा से मिला हुआ) की तहसील तुलसीपुर नगर से 1.5 कि॰मी॰ की दूरी पर सिरिया नाले के पूर्वी तट पर स्थित सुप्रसिद्ध सिद्ध शक्तिपीठ मां पाटेश्वरी का मंदिर देवी पाटन है, जो देशभर में फैले 51 शक्तिपीठों में मुख्य स्थान रखता है। यह शिव और सती के प्रेम का प्रतीक स्वरूप है। अपने पिता प्रजापति दक्ष के यज्ञ में अपने पति महादेव का स्थान न देखकर नाराज सती ने अपमान से क्रोधित होकर अपने प्राण त्याग दिये। इस घटना से क्षुब्ध होकर शिव दक्ष-यज्ञ को नष्ट कर सती के शव को अपने कंधे पर रखकर तीनों लोक में घूमने लगे, तो संसार-चक्र में व्यवधान उत्पन्न हो गया। तब विष्णु ने सती-शव के विभिन्न अंगों को सुदर्शन-चक्र से काट-काटकर भारत के भिन्न-भिन्न स्थानों पर गिरा दिया। पृथ्वी पर जहाँ-जहाँ सती के शव के अंग गिरे, वहाँ-वहाँ शक्तिपीठ स्थापित हुए। सती का वाम स्कन्ध पाटम्बर अंग यहाँ आकर गिरा था, इसलिए यह स्थान देवी पाटन के नाम से प्रसिद्ध है। यहीं भगवान शिव की आज्ञा से महायोगी गुरु गोरखनाथ ने सर्वप्रथम देवी की पूजा-अर्चना के लिए एक मठ का निर्माण कराकर स्वयं लम्बे समय तक जगजननी की पूजा करते हुए साधनारत रहे। इस प्रकार यह स्थान सिद्ध शक्तिपीठ के साथ-साथ योगपीठ भी है।
कहा जाता है कि इस शक्तिपीठ के कुंड में कर्ण ने स्नान कर सूर्य को अर्घ्य दिया था। यही कारण है की इस कुंड को सूरजकुंड कहा जाता है। इस कुंड का पानी बहुत पवित्र और गुणी माना जाता है। क्योंकि श्रद्धालुओं का मानना है कि इस कुंड में स्नान करने से पाप खत्म हो जाते हैं और कुछ लोगों को बीमारियों से मुक्ति भी मिली है।
सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर हैं। नाथ संप्रदाय का वर्चस्व आज पूरी दुनिया में मौजूद है। पीठाधीश्वर मिथलेश नाथ योगी गुरु पूर्णिमा के अगले दिन मां पाटेश्वरी की पूजा-अर्चना के बाद गुरु गोरक्षनाथजी के समक्ष रखे आसन पर विराजमान होकर शिष्यों को आशीर्वाद प्रदान करते हैं। देश-विदेश से आए हुए शिष्य उनको तिलक लगाकर गुरु दक्षिणा देते हैं।