राजाखेड़ा अपनी ही पुस्तैनी ज़मीन के लिए दर दर भटक रहा बुजुर्ग किसान,ग्रामीणों ने राजाखेड़ा तहसीलदार दीप्ति देव को सौपा ज्ञापन,,,
प्रशासनिक तरमीम के कारण प्रभावित खातेदारी भूमि की निष्पक्ष जांच कर राजस्व अभिलेखों में आवश्यक सुधार कराने की लगाई गुहार

राजाखेड़ा। राजाखेड़ा विधानसभा क्षेत्र के ग्राम पंचायत सिंघावली, हल्का सिंघावली, सिकरौदा मोड़ के समीप स्थित भूमि के संबंध में विगत दिनों कई शिकायत प्रशासनिक को प्राप्त हुए हैं, ज्ञापन में यह भी बताया है कि कारण उक्त भूमि विवाद का विषय बन गई है। वास्तविक तथ्य इससे भिन्न हैं। उक्त भूमि मूलतः संबंधित किसान की खातेदारी भूमि थी, जिस पर वह एवं उसका परिवार पिछले लगभग 50-60 वर्षों से निरंतर निवास एवं व्यवसाय करते आ रहे हैं। इसी भूमि पर वर्षों पूर्व उसकी दुकानें निर्मित थी। समय के साथ वे दुकानें अत्यधिक जर्जर एवं जीर्ण-शीर्ण हो जाने के कारण सुरक्षा की दृष्टि से अनुपयोगी हो गई। इसलिए संबंधित किसान ने उसी भूमि पर पीछे की ओर नई दुकानें निर्मित कर लीं। उसने किसी अन्य भूमि पर अतिक्रमण नहीं किया, बल्कि उसी भूमि का उपयोग किया जिस पर उसका वर्षों पुराना कब्जा, निवास एवं व्यवसाय रहा है। उक्त भूमि का मूल खसरा नंबर 1335 था, जिसका वर्ष 2003 में विधिवत आवंटन किया गया था। तत्पश्चात प्रशासनिक प्रक्रिया के अंतर्गत इस खसरा संख्या का विभाजन कर इसे 1457/1335, 1456/1335, 1455/1335, 1454/1335, 1453/1335 एवं 1452/1335 के रूप में दर्ज किया गया। किंतु विभाजन एवं प्रशासनिक तरमीम के दौरान राजस्व अभिलेखों में त्रुटि हो जाने के कारण संबंधित किसान की खातेदारी भूमि का रिकॉर्ड प्रभावित हो गया, जिससे आज यह विवाद उत्पन्न हुआ है। पुराने राजस्व अभिलेख, जमाबंदी, नक्शा, मिसल हकियत, आवंटन अभिलेख, फील्ड बुक तथा अन्य उपलब्ध दस्तावेजों के परीक्षण से यह स्पष्ट किया जा सकता है कि जिस स्थान पर पूर्व से दुकानें निर्मित थीं तथा जहाँ संबंधित किसान दशकों से निवास एवं व्यवसाय करता आया है, वह भूमि मूलतः उसी की खातेदारी भूमि थी। प्रशासनिक अभिलेखों में हुई इस त्रुटि के कारण आज एक वास्तविक खातेदार किसान अनावश्यक विवाद एवं मानसिक, सामाजिक तथा आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रहा है। मूल खसरा संख्या 1335 एवं उससे निर्मित खसरा संख्या 1457/1335, 1456/1335, 1455/1335, 1454/1335, 1453/1335 एवं 1452/1335 के समस्त पुराने एवं वर्तमान राजस्व अभिलेखों का परीक्षण कराया जाए। वर्ष 2003 के आवंटन आदेश, तरमीम आदेश, विभाजन अभिलेख, जमाबंदी, नक्शा, मिसल हकियत, फील्ड बुक एवं अन्य संबंधित रिकॉर्ड की गहन जांच कराई जाए। यह जांच की जाए कि प्रशासनिक तरमीम किस आदेश, किस आधार एवं किन अभिलेखों के आधार पर की गई। राजस्व विभाग द्वारा मौके पर निष्पक्ष सीमांकन एवं सत्यापन कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट की जाए। लगभग 50-60 वर्षों से चले आ रहे कब्जे, निवास, पुरानी दुकानों एवं उपलब्ध साक्ष्यों को भी जांच का महत्वपूर्ण आधार बनाया जाए। यदि जांच में यह सिद्ध होता है कि प्रशासनिक त्रुटि अथवा गलत तरमीम के कारण संबंधित किसान की खातेदारी भूमि के अभिलेख प्रभावित हुए हैं, तो राजस्थान भू-राजस्व कानून एवं अन्य लागू प्रावधानों के अनुसार आवश्यक संशोधन कर उसके वैधानिक खातेदारी अधिकार पुनः बहाल किए जाने की मांग की है। जांच पूर्ण होने तक संबंधित भूमि के संबंध में किसी भी प्रकार की एकतरफा अथवा दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाए।, हमारा उद्देश्य किसी भी अवैध कब्जे का समर्थन करना नहीं है, बल्कि अपना हक मांग रहा हूं। जो दशकों से उसी भूमि पर निवास एवं व्यवसाय करता आ रहा है तथा जिसके अधिकार संभवतः प्रशासनिक त्रुटि एवं गलत तरमीम के कारण प्रभावित हुए हैं। यदि जांच में पुराने राजस्व अभिलेख एवं अन्य साक्ष्य किसान के दावे की पुष्टि करते हैं, तो न्याय, विधि एवं प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप उसके खातेदारी अधिकार बहाल किए जाना उचित एवं न्यायसंगत होगा। अतः आपसे विनम्र प्रार्थना है कि उक्त प्रकरण की निष्पक्ष, पारदर्शी एवं तथ्यपरक जांच कराकर राजस्व अभिलेखों में आवश्यक संशोधन करवाते हुए पीड़ित किसान को विधिसम्मत न्याय प्रदान करने की मांग की है। संवाददाता ब्यूरो चीफ धौलपुर